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सचिन, ए बिलियन ड्रीम्स की कहानी, उन्हीं की जुबानी

19 मई 2017, 06:49 PM

मास्टर ब्लास्टर ने अपनी फिल्म - सचिन, ए बिलियन ड्रीम्स के बारे में नेटवर्क18 के साथ भी एक्सक्लूसिव बातचीत की। सचिन तेंदुलकर ने कहा कि वो छुपकर अपनी फिल्म देखने जाएंगे।

सचिन ए बिलियन ड्रीम्स के किस्से पर बात करते हुए मास्टर ब्लास्टर ने कहा कि यह फिल्म जिंदगी के अनछुए पलों की कहानियां है। फिल्म में सबसे बड़ी चुनौती हकीकत को ढालने की थी। साल 2012 में पहली बार फिल्म पर बात हुई थी और इसे बनाने का आइडिया फिल्म के प्रोड्यूसर रवि भागचंदका का था। लेकिन इस फिल्म में मेरी एक्टिंग करने की कोई चाहत नहीं थी। अंत में बड़ी मुश्किल से एक्टिंग करने को राजी होना पड़ा था।

वहीं फिल्म के प्रोड्यूसर रवि भागचंदका का कहना था फिल्म में सचिन को मनाने के लिए दिन में 10-10 बार फोन करना पड़ा। क्योंकि  इंटरनेशनल स्टार्स पर फिल्में बनी हैं और हमारा मानना था कि ऐसी प्रेरणादायक कहानी को मंच मिलना चाहिए। फिल्म में सचिन का किरदार सचिन से कराने की बड़ी वजह यह भी थी कि एक्टर से फैन्स इस कदर नहीं जुड़ पाते। सचिन को कैमरा फेस करने की आदत थी।

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर किस तरह की फिल्म बनाना चाहते थे? इस सवाल पर उनका कहना था कि फिल्म के लिए कोई शर्त नहीं लगाई। क्योंकि पारिवारिक क्षणों के अलावा सब जाना हुआ है। हालांकि काफी चीजें ऐसी जो पहले देखी नहीं गईं है और फिल्म में जहां तक परिवार सहज हो वहीं तक पारिवारिक जिन्दगी को दर्शाया गया है। लोगों ने देखी नहीं, ऐसी पारिवारिक बातें इस फिल्म में मौजूद की गई है।

फिल्म में सबसे ज्यादा समय फिल्म की संरचना बनाने में लगा। तकरीबन ढाई साल के बाद फिल्म एडिट करने में लगें। क्योंकि पूरी जिन्दगी को फिल्म में भरना चुनौतीपूर्ण था और वक्त की कमी से बहुत सी चीजें छोड़नी पड़ीं। मैंने महज क्रिकेट की बारीकियों पर ने ध्यान दिया।

सचिन तेंदुलकर ने आगे कहा कि फिल्म में हकीकत को पर्दे पर उतारा गया है। बचपन की सीन को दिखाने के लिए शूटिंग भी बचपन वाले घर में हुई है। फिल्म में उन्हीं जगहों का इस्तेमाल किया गया जहां खुद मैने अपनी शुरुआत की यानि वहीं कॉलोनी, बिल्डिंग, फ्लैट, मैदान सब वही हैं। इतना ही नहीं 16 साल की उम्र के सचिन का भी रोल खुद मैने ही निभाया। हालांकि इस सीन को दिखाने के लिए रिसर्च करके पुराने फुटेज निकाले गए। यहां तक के 14 साल की उम्र के वीडियो निकाले गए।

कैमरा और फास्ट बॉलर को फेस करने में अंतर क्या है? इस सवाल पर मास्टर ब्लास्टर न हंसते हुए कहा कि दोनों काम बहुत मुश्किल हैं। खेलों में रीटेक का विकल्प नहीं होता और फिल्म में रीटेक मिलता है पर एक्टिंग भी उतनी ही कठिन होती है। क्योंकि क्रिकेट दिल से और एक्टिंग दिमाग से करनी पड़ी। हर जगह आपको मंजिल का पीछा करना पड़ता है। 

इस फिल्म पर आगे बात करते हुए सचिन ने कहा कि फिल्म की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें ज्यादा ग्लैमर नहीं है। यह केवल संघर्ष की असली कहानी है जो 80 और 90 के दशक की जिन्दगी को दिखाएंगी।

मास्टर ब्लास्टर ने कहा आगे कहा कि वह फिल्म देखने जाएंगे या नहीं यह अभी सरप्राइज है लेकिन छिपकर फिल्म देखने जाने में ज्यादा मजा आएगा। क्योंकि इससे सही फीडबैक मिलता है। सिनेमा हॉल में सचिन-सचिन सुनना चाहेंगे? इस सवाल पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि सचिन-सचिन हमेशा से स्पेशल रहा है। मैं तो बचपन से खेलों में खोया रहता था। हां लेकिन सबसे पहले मां से सचिन-सचिन सुना था फिर उसके बाद स्टेडियम में भी सुनेना का मौका मिला।

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